हे नव वर्ष हम आतुर छी अँहाक सुवागतलाय। बहारिक बाट हरियर गोबर स निपलाय। ओहि निपल पर लाल एकरंगा ओछबलाय।पुरहरि भरि दुवारि सजबलाय।आमक नव पल्लव उपर प्रह्लाद लेसलाय।
बस अँहा हमर विन्ती , हमर आग्रह मानैत आयब। अपना स रुसलके मनबति आयब।भटकलके बाट देखबति आयब।भुखललाय भोजन परसैत आयब।मरैयाके चार छारैत आयब।ठिठुरललाय घुर फुकैत आयब।
खेतक खेसारी अछि अँहालाय।गुड भरल बगिया अछि अँहालाय।वसन्तक आगमन अछि अँहालाय।नव कनोजर अछि अँहालाय।पियर फुल अछि अँहालाय।
विवेकहीन अहि संसारमे सबकिछु लगैय बैराग जाक।नहि पकवान लगैय प्रियगर नहि कोमल वस्त्र सँग रहल सिनेह।नहि रहल श्रृङ्गारमे रुचि। नहि कुनो आभुषण के सँग।भोजन लगैग अनुन।जलमे लगैय नुन।
हे नव वर्ष ताय कहलौह विवेक लेने आयब।एक विवेक बिनु सबकिछु विरान।छल विवेक त छल परान।केना बुझबियै विवेकके ? अहि स सबकिछु अतत आसान।विवेक भरल दिमागमे नुन रोटी जेना छपन्न भोग।पुरान वस्त्र जेना पिताम्बर पटोर ।ताम पित्तर जेना हीरा जवाहर ।दिनके कि कहु ? राति सेहो अनमोल ।आगि लागल मन सेहो शितल । पुवारक सेज सेहो तकिया तोसक।
छन बितल , मिनेट बितल , बितल घण्टा घरी। दिन बितैत हप्ता बितगेल , बितलागल मास।मास पर मास बितैत बितैत पूरा हायत अब साल।नहि खबर अछि, नहि कुनो पत्ता, कतक अछि नुकायल ? हमरे स आइ हेरायल अछि हमर विवेक भरल मन।
मुनल नयनमे , सँग रहैय हमर ओ सदिखन
खनैक रहल कंगना बनि ओ हाथमे खनखन
ओकरो हियामे हम धडकति छी हमरा अछि बुझल
बहि परैछै ओकरो नयन , बहे मोर नयन जखन
अरजैय लिय किछु ओहन धन जे नहि छोरे अँहाक सँग।बिजुली गिरै चाहे बाढि आबै रहे सदिखन सँग।भुकम्प स हिल जाइ घर्ती भले नहि टसके ओ अँहा स दुर।लसा जा सटल रहे हियामे , गरमाबति रहे हेमन्तक पुसमे बनिक ओ घुर।
नहि जायत सँग अँहाक अरजल मान सम्मान
नहि जायत सँग अरजल मोटरगाडी मकान
नहि जायत सँग अँहाक देलगेल तिरस्कार अपमान
नहि जायत सँग अँहाक खटल दिनरातिक
थकान
पढिलिय अढाई अक्षर छकि ओ बड बलवान
ओहे पकरि हाथ अँहाक भरायत बडका उडान
करायत ओहे दु आत्मा बीच फेउर मधुर
मिलान
छोरादेत मोह अहिजग स परमात्मा उतरत परान
हे नव वर्ष विवेक बिना सबकिछु अर्थहीन ।अँहा जगके हितकारी बनि आउ।परोपकारी बनि आउ। सुरुजक अग्नि लेने आउ।चानक ठंडी लेने आउ।इह सब बिच सामंजस राखलाय सँग विवेक लेने आउ।
विचित्र समय चलिरहल।हीरा हेराय रहल।अबरक प्रतिष्ठित भयरहल।हीरा कबाडमे फेकारहल।अबरक तिजोरीमे संजोगारहल।हीराके चिन्हलाय विवेक चाहिँ।पाँथरमे भगवान देखलाय करुणा भरल हृदय चाहिँ।मुढ कि जनतै पाँथरके महत्त्व ? कसाइ कि जनतै दोसरके पीडा ? कहबी छै जिनकर पैर नफटे बेमाय ओ कि जाने पीर पराय ? दर्द कि चिज छै ओहे जानि सकैत छै जे ओकरा भोग्ने छै ? सुखक मान्य कि छै ओहे जानि सकैत छै जे दुख स उबरल छै ? या ओ मनुष जानि सकैत छै जकरा सँग विवेक छै।जकरा लग विवेक छै ।ओ बिना किछु भोग्ने ओकर मर्म महसुस कयसकैत छै।ताय कहलोह हे नव वर्ष हमर विवेक लेने आयब।
महाविदुषी सब कहैत छथिन मौनमे विवेक छै। जत विवेक छै ओहिठाम सुधा वर्षै छै।अविवेकी लग सुधा नहि ठहरि सकैतछै।सुधाके पान करलाय विवेक बन परैत छै।सभहक हिस्सामे सुधा नहि।ताय त भगवान विष्णु मोहिनीके रुप धारण केलखिन।सुधा भरल कलश अपन हाथमे सम्हारलखिन।
पुरना सालके अन्त सँग व्यभिचारके अन्त होइ।विषक विनास होइ।हिंसाके बिदाइ होइ। झुठक महल ढहिजाइ।कलेस पीडा जरि राख बनिजाइ।
हे नव वर्ष नव सालमे चराचरमे सुधावाणी रहै।सुधा आचरण रहै। सुधाक सागर बहै।सुधा भरल दृष्टि रहै।सुधा भरल सृष्टि बनै।ताहिलेल तु विवेक लेने अबिहा।सुधाके विवेके चिन्ह सकैत छै।सुधाके पुण्य विवेके जानिसकैत छै।
हम जनैत छी –
सुवास उडियबैत बहिरहल फेउर फेउर ओ पवन
आसमानी भय चमैक रहल फेउर फेउर ओ गगन
उर्जा बटैत उतरि रहल फेउर फेउर ओ
सुरुजक किरण
मन्द मन्द मुसुकि रहल फेउर फेउर ओ चान तरेगन ।
मगर विवेक बिनु ओ बात कहाँ ? बिनु विवेक ओ राज कहाँ ? बिनु ओकर ओ मजा कहाँ ?
कंगन जोहिरहल बाट खनकलाय खनखन
पाजेब आतुर भेलअछि छनकलाय छनछन
चतुर मन लुटब अगुतायल संजोगल
सबटा धन
निछावर करलाय ओकरा पर अपन पवित्र तनमन
भेटजायत जाहि स रामरत्नधन नेहाल भजायत जीवन
ताय हे नव वर्ष स्वीकार करिहा हमर विनय।मानिजैहा हमर आग्रह ।सँग दिव्यरुपी सनेस विवेक लेने अबिहा।
जत विवेक छै कि ओत दुख टिक सकैत छै ? जकरा लग विवेक छै ओकरा सँग सुख छै। शान्ति छै। शान्ति पसरल हृदयमे आनन्दक बास होइत छै।आनन्द माने भगवानक झलक।परमात्माक निकटता।
हे विवेक अँहा समुद्र छी।हर नदीक अन्तिम उदेश्य अँहास मिलब।हर बुन्दके प्यास अँहामे डुबब।अँहामे विलायब। अँहामे समाहित भजायब।बड अद्भुत छै इह सृष्टिके नियम।अपनाके मिटादेला पर अस्तित्वक महसुस होइत छै।मनके सुकुन भेटैत छै।विराट स आलिंगन होइत छै। हे विवेक अँहाके प्रणाम। हे विवेक कोटि कोटि चरण स्पर्श ।
लेखक – सुधा मिश्र














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