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मैथिली कथा-दुतरफा मन मिललमे सबकिछु जायज छैक?

सजिलो पोस्ट सजिलो पोस्ट
बैशाख १, २०८१, १०:२२ मध्यान्ह
मैथिली कथा-दुतरफा मन मिललमे सबकिछु जायज छैक?

हमर आँखि मोबाइलक स्क्रिन पर जा ठमकि जाइत अछि देखि जे इयाह आदमी फेउर स फ्रेन्ड रिक्वेस्ट पठोने छकि।मनमे कौतहुलता मचि जाइय जे आखिरमे के छै इ आदमी?

हम चेक करलाय ओकर प्रोफाइल खोलैत छी।कभर फोटोमे देखैत छियै राष्ट्रपतिके हाथ स पुरस्कार ग्रहण करैत।बुझबामे देर नहि लगैत अछि जे जरुर कुनो पँहुचल आदमी छकि।

हमर आँगुर स्क्रिनके उपर उपर लयजाय लगैत अछि।पोस्ट सब देखला पर पत्ता चलैय जे ई मनुष कुनो वरिष्ठ साहित्यकार छथिन।

अपना पर कनिक देर मन पिताजाइय जे हमरो कखनो कखनो नहि जाइन कि भजाइय ? एकबेर तहिए प्रोफाइल खोलि देख नेने रहितियैत कि बिगडि जैतै हमर?
ओ त हुनकर बडप्पन छनि जे हमरा फ्रेन्ड रिकवेस्ट रिसेन्ड केलखिन।

हम कन्फर्ममे जाक क्लिक करैत छी।यु आर नाउ फ्रेन्ड लिखदति छै।हमर दिमाग ओझरा जाइय अहिबात पर जे एहन पैघ आदमी हमरा सन छोटछिन आदमीके कोना मीत अनुरोध पठेलखिन ? हमरा हुनका बीच कोनो चिनजान नहि अछि ?नहि आइतकि हम हुनका कहियो देखनहि छियैन ?

एकाएक मनमे एकटा बात अबैय कहि हमर पोस्ट त अहिक कारण नहि छकि ?इयाह बात हेतै ! पक्के हमर पोस्ट हुनका कतौ ने कतौ छुने हेतैन ? अपना पर कनिक मनिक गर्व महसुल होबलगैय। किछुए सही हमरो कलम चलब अबैत अछि। नहि त प्राज्ञके कविताके महारथी भेल आदमीके अलायबलाय जेहेसेहे थोडही पसिन परिसकैत छै ?

मन खुशी भय झुमलागल छल ।थोडबे सही हमरोमे साहित्यिक गुण पक्के अछि।आश्चर्यचकित त हम हुनकर मेसेज देखि रहिगेल छलौ।` विवेकाजी धन्यवाद साथी बनक लेल।अँहा बन्हिया कलम चलबैत छी।´

हमरा किछु नहि फुरारहल छल कि जबाबमे लिखु।मन मेसेज पढि प्रफुल्लित भगेल छल।बडीदेरक मनक मंथनके बात हम जबाबमे लिखैत छी, ` नमस्ते सर! थैक्यु सर! ´

तकरबाद बहुत दिन करिबन दु-तीन महिना हमरा सभके बीच कुनो तरहक सम्पर्क नहि रहल छल।मेसेन्जरके नोटिफिकेसन अफ राखबाली हम मेसेजो आयल त नहि बुझि पबैत छलियै ।अहिना एक दिन खोलैत छियै त देखैत छियै सर दु तीन दिन स लगातार विवेकाजी विवेकाजी लिखिक मेसेज पठारहल छलखिन।

हे भगवान हमरो आदत नहि ! सर कि कह‌ैत हेथिन? हम झट्ट दब्बर ` नमस्ते सर ´लिखिक जबाब पठबैछियै।सर अने लाइन छलखिन।मेसेज लिखैत छषिन ,` विवेका फुर्सत मे छी ?´

`जी सर ! कहुन।´

`एकटा प्रोग्राम हमरे संस्था अनलाइन कय रहल छै।शनिदिन भोरमे न बजे स शुरु छकि।हम चाहैत छी अँहु अहि प्रोग्राममे कविता वाचन करी।कुनो दिक्कत त नहि ने? ´

हम सोचमे परिजाइत छी जे कि करु? आइतकि वाचन नहि केने छलौह।कायोटा पत्रिका सबमे पब्लिस छल हमर लेख आर रचना सब मुदा वाचन पर्दा आगुक चीज स सबदिन छिटकति रहबाली हम वाचन स दुरे अपनाके रखने छलौ।हमरा दिस स कुनो जबाब नहि आबि देखि सर लिखैत छथिन, ` कि भेल विवेका ? अँहाके कविता सब हम नीक आर मार्मिक रहैय।अँहा सन सन आदमीक जरुरी छकि अहि क्षेत्रमे।हम ओहिना झट्टा नहि फेकिरहल। पढने छी अँहाक किछु रचना सब ताय कहिरहल छी । पर्दाक आगु एनाइ सेहो जरुरी होइत छकि।´

हम सरके मेसेज पढैत छी।तैयो नहि जाइन कि दिमागमे चलिरहल छल।किछु जबाब नहि कय पबैत छी।ओहिना नहि कहल गेल छकि जत नहि पँहुचे रवि ओत पँहुचे कवि। सर हमर मन जेना पढिलेने हेथिन।फेउर मेसेज करैत छथिन।

` अतेक संकोच किया? इह संस्था अपने अछि।अहिठाम जतेक आदमी रहथिन से सभ चिन्हले जानल रहथिन ।कवितामे वाचनके बाद परान भरिजाइत छै।ताय हम फेउर कहब जे अँहा जरुर करी।ओना हमरा विशेष किछु कहबाक हक त नहि पँहुचति अछि।आशा करैत छी हमर कहब अँहा बुझैत होयब।´

कत कत सरके कहल बात सब भितर घर करैत चलिगेल छल।मनमे आवाज आयल सर सब ठीके कहिरहल छथि ।ओहु स बडका बात हमरे लेल कहिरहल छथि।
` जी हेतै सर!´, कहि हम मेसेजके रिप्लाई करैत छियै।

` आब भेलै नहि बात। त भेटैतछी शनि दिन सुबह ठीक न बजे। ´

जेना लगैछल‌ै सर अहिबातक बाट जोहिरहल हेथिन। हम धिरे धिरे अहि संस्था बाहेक सर द्वारा लिंक पठायल दोसरो संस्था सबमे वाचन करलागल छलौ।हमर रचनाके बन्हिए प्रतिक्रिया भेट रहल छल।सर सब दिन प्रोग्रामक बाद ` बहुत नीक छल !गजब!´ लिख पठब नहि बिसरैत छलखिन।सरक पठायल एहन लाइन सब हमरामे उर्जा भरिदैत छल आर हमर हौसला बढैत चलिजाइत छल।

सर हमरा बीच बीचमे कायदिन कार्यक्रम संचालनके लेल सेहो आग्रह करैत छलखिन।मुदा हम सबदिन नहिमे जबाब दय दैत छलिय‌ै।अहिमे किछु अपनो विवशता छल।घरक नेटके ठेकान नहि रहैत छलै।इन्भरटरके सुविधा नहि छल ।दोसर कारण छल झरकल मुह झापले सुन्दर।हम कहियो भिडियो खोलि आइतकि नहि जुरल छलियै।होस्ट सभके अनुरोध पर टेक्निकल प्रोब्लेम कहि टारिदैत छलियै।

बहुत दिनक बाद सरके संस्था प्रेम दिवसके उपलक्ष्यमे अफलाइन प्रोग्राम कयरहल छलै।सरक आग्रह पर हमहु ओत पँहुचलौ।सरके कहियो नहि देखने छलियनि सोझासाझी।हमरा चिन्हबमे ठीक स नहि आबिरहल छल सर कुन छथिन ? हम मंच पर आसिन सभके एकही बेरमे नमस्ते करैत भितर जाय लगलौ त किनको कहैत सुनैत छियै, ` इहे साहित्यकार विवेका छथिन।ईह सब दिन अपने मातृभाषामे वाचन करैत आयल छथिन।´

हमरा बुझमे चलि अबैत अछि जे इयाह सर छथिन। हम सरके कहब सुनि अकबकायले रहिजाइत छि । मनमे प्रश्न उठ‌ैय सर कोना हमरा चिन्ह गेलखिन ? सवालके जबाब नहि खोजि हम प्रोग्राम सुन लगैत छी।अपन नाम अयला पर हम अपने मातृभाषामे कविता वाचन करैत छी। प्रेम दिवस भेलाके कारण प्रेमेके परिधि पर घुमिरहल हमर कविता छल,
` राखिक कमेन्टमे ,मोनक हाल
चित्तचोर कदैय, हमरा बेहाल
छिन लैत अछि, हमर दिन राति
शब्द शब्द जोडिक ,पंक्ति चारि
अछि इ देवता ,बडका हरिफ
तैयो लागे, किया किया सरिफ
अन लाइन चोरी भेल दिल
कडगर हम गेल छी हिल´

तालीक गुजं आर कविता नीक छल कहि नीकक सिम्बल मुट्ठी मुनल हाथ सभगोटेके देखि हमहु आनन्दक सागरमे बहिरहल छलौ।ईह हमर पहिल एना भौतिक रुपमे उपस्थित भयक कायल वाचन छल।सर हमरे दिस ताकिरहल छलखिन।खुशी स दाँत देखारहल छलनि।

प्रोगाम समाप्त भगेल छलै।जलखै चाय चलिरहल छल‌ै।अबेर होति देखि हम सोचैत छी आब निकल लाय स ठीक।सरके भेटिक जायब ठीक बुझि हम सर स भेट पँहुचति छी।
` सर बिदा दी।हम जाइ त आब।´, कहैत दुनु हाथ जोरैत छी।

` अखने किया? किछु देरि आउर ठहरि सभ स मिलजुलि त लिय।चाय पिलौ?´

हम `जी´ कहि बेर दिस ताक लगैत छी।
सर बुझि जाइत छथिन।

` अच्छा! अबेर भयरहल अछि। हँ किछु देरक बाद साँझ परिजेतै।बड खुशी लागल एलौ ताहिलेल।अहिना आब अबैत रहब।अँहाक वाचन कतेक सुन्दर अछि आइ त बुझागेल हायत ने ? अँहाके हम कहैत रहैत छलौ त होइत रहैत छल सर हमर मन राखलेल कहिदति छथि।आनो भाषाभाषी सभ झुमि उठल छल।´

सरके मुह स एना अपन बडाई सुनब हमरा बड नीक लागि रहल छल।हम लजाइत कहैत छियै, ` अकर श्रेय अपनेहीके जाइत अछि।´

सर हँसैत कहैत छथिन, ` कि कहलियैय ककरा रे? हमरा ? हमही ओत वाचन केने छलियैय नहि! अहिमे सय प्रतिशत श्रेय अँहाक अपन अछि।´

` जी आब हम चलि त।´, हमरा मुह खुशी स निपागेल छल।

` हँ हँ जाउ। अहिना अबैत रहब।´

` जी जरुर सर ! थैक्यु सर!´, कहि हम हाथ जोरि नमस्ते कय बिदा भजाति छी।

अहिना अौपचारिक भेटघाट आउर प्रोग्राम सबमे हमरा सर सँग होइत चलिगेल। सर सँग हमर नम्बर त छलनि मुदा फोन आइतकि नहि केने छलखिन।जे फोरमल जानकारी होइत छलै से बहुत छोटमे मेसेज कदैत छलखिन।सरके नम्बर स मोबाइलके टुनटुनाति देखि हम असमंजसमे परि जाइत छी कि करु , उठाउ कि नहि ! फेउर कि मन फुराइय उठाक ` हेलो´ कहैत छियै।

` विवेका हमरा चिन्हलौ? किछु देर बात कय सकैतछी ?´

`नमस्ते सर! जी किएक नहि? कहु ने, कि कहबाक अछि ?´

` अहिबेरक प्रोग्राम अँहिके संचालन कर परत।ओ काज विशेष स बाहर छथिन।´

` जी जी हम हम कोना ——?´

` हमरा बुझल अछि अँहा नीके स नहि खुब नीक स संचालन कय सकैत छी।बहुत आश लय अँहाके कहिरहल छी।हमरा विश्वास अछि अँहाके हँ रहत।´

हमरा सरके नहि कहल नहि होइय।हमर चुप्पी सर पढिलति छथिन।

` खुशी लागल हमरा! न बजे स प्रोग्राम छकि । अँहा एक आध घण्टा पहिनही कनि चलि आयब ।हम नामक लिस्ट अँहाके बुझादेब।आब राखु त फोन।अहिकेलेल थैक्स विवेका !”

हमरा त कि लोको सभके विश्वास नहि भयरहल छलै जे हमर इ उद्घोषण पहिल बेर छकि।ओना त हम अपन क्षेत्रमे प्रोग्राम संचालन करैत आयल छलौ मुदा साहित्यिक क्षेत्रमे पहिल बेर छल।प्रोग्राम संचालन ढंगक होबाक कारण छलै जे कायबेर पहिनेही स सर हमरा कहैत आयल छलखिन । जाहि चलत‌ै हरेक प्रोग्राममे हम उद्घोषक सब कोना कि करैत छ‌ै से ध्यान दति चलि आयल छलियै।साहित्यकिक प्रोग्राम एनाक संचालन कायल जाइत छै से हम नीक जका बुझिगेल छलियै।

अपन वाहवाही ककरा नहि नीक लगैत छ‌ै ? हमर नाक फुलिगेल छल।जकरा अपना उद्घोषण पर बड गुमान छलै सेहो
आइ हमरा बारेमे नहि बाजि चुपरह नहि सकल छल।आब जाय परलै से कहि सर स हम अनुमति लेब जाइत छी।

` आइ त शनि छै। अवश्य छुट्टी हायत।साँझो नहि भयरहल छै से अन्हार भजायत।फेउर घर सँ किछुए फटकिमे छी।किछुदेर त रहु आउर।सबके बिदा कय स्थिर स दुनुगोटा चाय पिबी।अहि कहुत कहियो आयल छी अँहा चायपर बजेला पर ? विवेका आई हँ कहिटा परत।´

हम स्वीकृतिमे माथ डोलादति छियै।सभके गेला पर सर दु कप चायके अर्डर करैत कहैत छथिन ,` एक कप बिना चिन्नी आर एक कप चिन्नी भेल।´

` नहि नहि एक कप बिना चिन्नी आर दोसर कपमे ओकरोबाला सेहो चिन्नी।मतलब दोब्बर चिन्नी।´

सर हमर कहब सुनि हँसलगैत छथिन।हमरा सँ पुछैत छथिन , ° कुनो दिक्कत त नहि रुकमे ?´

हमरा मनमे बहुत रंगक बात खेललगैय।सरके बारेमे बहुत उटपटांग बात सब सुनने जे छलियै।भितर भितर डरो लागिरहल छल।मुदा मनके ईह कहि सम्हारि लति छली जे अपने भल त जगत भल।हमरा सँग त कतेक सभ्य भलाद्मी जका रहैत छथिन।कौवाक पाछु लागब स नीक अपन कानके छाबि।

हमरा किछु नहि बाजि आनठमन हेरायल देखि, ` कि भेल? ´

`जी नहि किछु।´

ताबितेमे चाय टेबुल पर पँहुचादति छै।

` अकरा अहिठमनके चाय बन्हिया रहैत छै।ताय महगो रहलापर पैसा तिरमे झिझक नहि होइत अछि ।´

चाय सचमे बन्हिया छलै। हमहु ` हँ ´ मे माथ डोलाबति छियै।दुनुगोटा बीच अौपचारिक सँग अनौपचारिक बातचीत होइत होइत एक डेर घन्टा बीत गेल छलै।अहिबीचमे सर दोहराक सेहो चाय मँगबा नेने छलखिन।ईह त बुझबामे चलि आयल छल जे चाय पिब मे सर हमरे जोरी छथिन । नीक लागिरहल छल सर सँगक बातचीत ।पत्ते नहि चलल छल कोनाक डेर घण्टा बीत गेल छल ?

` विवेका हृदय स धन्यवाद ! एनाक हमरा साथ देबाक लेल।हमर बडका समस्या लगैय टरि गेल।आब स प्रोगाम सब संचालन करके जिम्मा अहिके रहत। हँ एकटा आउर अनुरोध अछि अँहा स।अँहा पत्रकारिता सेहो करैत छी ताय समाचार बनबाक सेहो जिम्मा ललितौ त हमरा उपर बडका उपकार होइत।अँहाके आधा घण्टाक काजमे हमरा चारिपाँच घण्टा लागिजाइत अछि।´

हम हँ नहि किछु नहि बजैत छियै।

` खायब किछु?´

` नहि सर!´

` अबेर भगेल नहि।हेतै जाउ आब अँहा।हँ आजुक कविता बहुत मार्मिक छल।लग‌ैत छल जेना भिजक लिखने होइ।”

` तहिना कह परतै।भोगल चिज उतारके प्रयास केने छलियै।थैक्यु सर! ´

धिरेधिरे कहियोकाल अौपचारिक बहस लेल आयलो पर अनौपचारिक बातचीत होबलगैत छल।निकटता बढिरहल छल।सर कहियोकाल प्रोग्राममे एनाक हमरा खौजादति छलैथ से हम लजाजाइत छलौ।किछु नहि कहि हम किछु नितरायल आर किछु तम्सायल नजर स सरके देख लगैत छलौ।हमर कनि अठारहो शताब्दी बाला आदत सबके चलिते जानि जानिक सर सँग आउर एकदु गोटे मीत सभ खौजादति छलथि।हम सभके भाव बुझिजाइत छलियै ताय हमरा पित्त नहि लहरि लाज लागिजाइत छल।सब स नीक ई बात लगैत छल जे हमरा पूरा स्वतन्त्र छोरिदति छलैथ प्रोग्राम संचालनके लेल।हरेक चीजके व्यवस्थापन हमरा उपर छोरिदति छलखिन।कखनोकाल अपना लगितो छल जे ओहिठाम हमरा ओना नहि कय एना करक चाहिँ।मुदा हुनका किछु त्रुटि हमरामे नहि देखाइत छलनि।उन्टे आबिक कहैत छलखिन जे ` हमर दिमागे काज केनाइ छोरिदेने छल जे आब कि कायल जाय ? थैक्स विवेका ! कतेक सहज ढंग स अँहा सबकिछु सम्हारि लेलियैय।´

धिरेधिरे हम सर सँग फेमिलियर होइत चलिगेल छलौ।सरके अपना उपर धियान रहल देखि मन हर्षित भजाइत छल।नयाँ वर्षक उपलक्ष्यमे सर हमरा आउ सँग नव वर्षक ईभ मनबै छी कहिक फोन करैत छथिन।संयोग स हम ओहिठाम बाटेमे रहलाक कारण सर कहैत छथिन हम अँहाके देख लेलौ ।अहि लेफ्टबाला सेकुवा हाउसमे हम छी। अँहा अतै चलि आउ। हम बाहर ठार होइत छी।

हम ओहिठाम पँहुचति छी।सरके देखि नमस्ते कय नव वर्षक शुभकामना आदानप्रदान कर‌ैत छी।

` कि खायब ? लिय अर्डर करु।´ , कहि सर मेनु हमरा दिस बढबति छथिन।

°नहि ! किछु नहि ! ´ , कहि हम मेनुके मोरिक धयदति छियै।

°हमरा त खायके अछि ´ , कहि सर ओहिमे स सेकुवा स्नायक्स जे सब मन होइछनि अर्डर करैत छथिन। ` कुन वाइन कहियै ´ से कहि हमरा दिस तकैत छथिन।

हम कनि पिताइत , `अपना पिबाक मन अछि त करु।हम ईह सब नहि पिबैत छी।´
` हम असगरे! ´ सभके टेबुल दिस ईशारा करैत ,` देखियौत सब किछु नहि किछु पिब रहल छै । ठीक छै त वियरे कहैत छियै।´

`कहलौ ने , अपने के पिबाक मन करैय त पिबु ने।हमरा नहि कहु।´

` एके प्याक विवेका!´

` ठीक छै हम जारहल छी।हमरा किछु काजसब करबाक बाँकि रहिगेल अछि।´

` पितागेलौ! हमरा बुझल छल अँहाक इयाह प्रतिक्रिया रहत।तैयो कहलिय कहु केय जनैय नव वर्षक इभमे कहु मन डोलिजाय ?´

सरके कहबके लयभाव सुनि हमरा हँसी लागिजाइत अछि।

` खराब नहि मानब! अँहाक हँसी बड मनमोहक अछि।´

बातेबातमे हमरा जे बात परेसान कय रहल छल हम पुछिलति छियै।
` सर अपनेके बारेमे बहुत अफबाह बाहर सुनमे अबैत अछि।अपने कहादुन छौरीमौगी ——–।बाहर किछु होउक।हमरा सबटा मिथ्या लगैत अछि।अतेक दिन स हम अपनेक सम्पर्कमे छी।कहियो भनक तकि नहि परल।´

सर किछुदेर चुप रहिजाइत छथिन।कनिक देरके बाद माथ पर स टोपी उतारि पसिना पोछैत छथिन। चश्मा उतारि टेबुल पर धदैत छथिन।

हम हरबरा जाइत छी।लगैय जेना हमरा स गलती भगेल होय।हमरा एना नहि पुछबाक चाहिँ ? हमरा कुन मतलब हुनकर संबंध दोसर सँग केहन छै ?

सर स्थिर भय पानि पिब कहैत छथिन ,`
हम ईह नहि कहब बाहर जे हल्ला छै से पुरा मिथ्या छै।एक समय छलै। हमरा बन्हिया पद पर नोकरी छल।जहाँतहाँ मिडिया स लक अखबार – पत्रिका सउसे हमर कविता पसरल रहैत छल । केतेको कल मेसेज हमरा अबैत छल।देखहुमे भगवान तेहने गढिक पठेने छथि जे लोक नहि चाहितोमे हमरा देखलगैत छल।हमहु नव युवक छलौ।ककरो ककरो कहल बात एनाक छुबिजाइत छल जे मन कह लगैत छल जे दुतर्फा मन मिललमे सबकिछु जायज छकि । कहियोकाल त अविबाहित महिला सभ सेहो एनाक किछु कहिदति छल जे हमरा खुद अपना कान पर विश्वास नहि होइत छल।हम झिझैक जाइत छलौ।ओकरा सब स छिटकल फिर लगैत छलौ।एक त कहले गेल छै पुरुष भमरा होइत छै।एहन एहन फुलाय लागल कोढी स्पर्श करतै त केय बिन भमरा बन्ने रहि सकैत छै ? ,कहैत सर एकब्याग चुप भजाति छथिन।

` ठीक छै।केउ नादान भगेलै त कि हमहु नादान भजायब ?´

` अत ककरा नादान कहबै ? सब एकटा बयस पर पँहुचल रहैत छ‌ै ।´

` अपने एहन बुझनुक आदमी छी।कि ईह उचित छकि आइ ओकरा सँग त काल्हि ओकरा सँग ? विज्ञान सेहो कहैत छकि जे बेसी आदमीक एहन सम्पर्कमे रहबालाके चेतना पर असर परैत छै।अपने जनिते ——।´

हम सरके मुह देखि चुप भजाति छी।हमरा लग‌‌ैय हम किछु बेसिए बाजिगेल छलौ।सरके संयम देखि हमरा अपना उपर अपराध महसुुस भयरहल छल।किछुदेर माहोल पुरा निशब्द भगेल छलै।हमरा किछु नहि समझमे आबिरहल छल कि बाजु ? कि करु ?

` सरी सर ! हमरा एनाक नहि बाजक चाहिँ !´

`नहि नहि बरु हमरा आइ खुशी लागिरहल अछि जे ककरो हमर फिकिर त छै।जायह हमरा स अँहाके लगाब अछि ताय ने पुछलौह ।नहि त अहि दुनियाँमे कहाँ छै लोकके फुर्सत जे ककरो नीक सोचतै ? एकटा बात कहु ?´

` जी मज्जा स!´

` हमरा एकटा चिन्ता भितरे भितरे खारहल छल जे कि बात हमरा स ओहन भगेल अछि से हमर आर हमर काजके पुरापुर ध्यान रखितोमे अँहा हमरा स छिटकल छिटकल रहैत छी।ओतेक भिडभाडमे सेहो सरलाय बिना चिन्नीके चाय , सरके पसिनके मो मो सरलाय याद रहैत छल।पूरा जिम्मेवारी अपने उठाक प्रोग्राम स बेफिक्र हमरा बनादैत छलौ।सरके बीच बीचमे पानि चाहैत रहैत छनि से कहि पानिक याद राखैत छलौ।अतेक सब हमरालाय करितो मे हमरा स दुरदुर अँहाक रहब हमरा अखरि जाइत छल।आइ सचमे मन बड हलुक भगेल लगैय।´

चाय लक चलिआयल छलै।हम कहैत छियै , `बिना चिन्नी बाला चाय उम्हर आ ओहु कपक चिन्नीबाला चाय यम्हर ।

´चायलेनहारके ईह सुनि हँसैत देखि हमहु दुनुगोटा हँस लगैत छी।

हम टोपी उठा सरके माथपर धय दैछियनि।चस्मा लय पहिरलाय दति छियनि।चायक कप उठबलाय कहैत छियैन।अपनहु कप उठाक `चियर्स ´ कहैत छियै।सर हँस‌ैतके हँस‌ैत रहिजाइत छथिन।रेष्टुरेन्टके लोक सभ सेहो हमरा सभके देखि ओहो सभ अपनामे फेउर चियर्स कर‌ैत छै।रेष्टुरेन्टमे लगैत छै जेना चियर्सक संगीत घनकय लागल होइ।

` हमरा होइत छल अँहा फोटोलेल इ सब कयरहल छी ? मुदा नहि ! जे होउक मन गदगद भगेल।´

हम मनेमन सरके फोटोके भुत हरदम सवार रह‌‌ैत छनि सोचि मुस्कराति कहैत छियै , ` ई कुन बडका बात छै ? धानेके पान त मोर दतरमुवाके पाने नहि !´

ओहि चायलेनहारके मोबाइल दति कहैत छियै, ` भाइ एकटा हमर सभहक फोटो
खिचदियन।´

सरके खुशी देखि हमरा लग‌ैत अछि जे
नव वर्षक ईभके वसन्त आबि छुबिरहल होइ।गामक आमक मज्जरक गमक स इहो जगह गमगमा गेल होइ।रेष्टुरेन्टक चौरमे ओछयाल पलाष्टिक घाँस ,घाँस नहि रहि सरिसोक फुलमे परिणत भयगेल होइ।

दुनुगोटा जायलेल बाहर निकलति छी।सर धिरे स हमरा कहैत छथिन, ° मोन होइय कनिक देर अँहाक हाथ पकरि दु डेग चलितौ।लागत तब हमरा जेना स्वर्गेेमे छी।´
` फेउर बदमासी शुरु! अपने अपन चालि छोरबाला नहि छि !´

` त अपन चालि हम कत पुरा करु? अहि त अपन छी !´

` हमरा नहि किनको अपनआन बनबाक अछि । हम चललौ।´

` ईह रुप देखने बिना हम कोना जा सकैत छलौ।सच कह‌ैत छी विवेका अँहाके ईह रुप हमर करेजाके छुबिजाइय।किछु पितायल ,किछु नितरायल ,किछु उलहन , बहुत अपनापन स भरल !´

`बस बस भगेलै । कविता रचके कुनो आवश्यकता नहि छकि कविजी ।नीक स जायब।उबवर खाबर देखिक रस्ता पर चलब।बेत त किया लक चलब अपने ?´

` लोक जे बुढ कहिदेत।सभ लाइनो मारनाइ हमरा छोरिदेत।बुढबा अखने स कहाब लागु ?´

` नहि जाइन कुन जमाना चलि आयल छकि ? पहिने माउगमेहरके लोक लाइन मारैत छलै।आब पुरुषपात्र मरबाबलेल बेचैन रहैत छै।चुपचाप बाट धक सिधे घर जाउ।अतेक सुन्नर म्याम छथि हुनका स जतेक लाइन मरेबाक हायत मरबालेब।´

सर हमरा एकटकरे निहारि रहल छलखिन।हमरा केनादुन लाग लागल।आँखिएक ईशारा सँ पुछति छियै ` कि भेल?´

` जेना लगैय ओहि जन्ममे कुनो बडका पुन्य कय आयल छी जे भगवान अँहा सनक आदमी सँ भेटेलथि।जिनगी बड सुन्दर लाग लागल अछि ।नव वर्षक उपहार माँगु अँहा स। ´

` हँ! हँ !अवश्य । हमरा लग कुबेरक खानी अछि।अपनेके निराश पक्के नहि होबपरत।´

` हमरा वचन दिय हमर साथ कहियो नहि छोडब।सबदिन अहिना अपन सभहक सिनेह बनल रहे।´

सरके आँखिमे भावक गंगा भरिगेल छलैन ।हमहु सरे सँग भावमे बहलागल छलौ।सर त अपन गंगामे बान्ह लगा लेने छलखिन।मुदा हमरा स नहि पार लागल छल।हमर गंगा हहियाति फफियाति बहिरहल छल ।हम मुरि झुकाक हँ मे माथ डोलबति छि।

` थैक्स विवेका! हम सदैव अँहाक आभारी रहब।´, कहैत सर हमर बहिरहल धारके अपन रुमालमे भरिलति छथिन।

अहि स आगु सरो नहि किछु बाजि सकल छलखिन।दुनुगोटा एकदोसर दिस ताकि हाथ हिलबति बिदा होइत छी।

दिन बितैत गेल छल‌ै।आजुक प्रोग्रामके बारेमे हमरो पोस्ट राखके मन भयरहल छल।सबगोटे चलिगेल छलखिन।अगिलका प्रोग्रामक बातचितक लेल हमरा सर रोकिलेने छलथि । कोनाक कायल जाय ? तकर रायविचार लेल।बातेचितक बीचमे हम पोस्टमे पोस्ट करलेल अपन सेल्फी लेबलेल सबकेशके समैट एककात आगु कन्हापर मिलारहल छलौ।सर हमरा देखरहल छलखिन।

` बड सुन्दर लागि रहल छी अँहा आई।´

हमरा लाज लागिजाइय।हम लजायल नयन स सर दिस तकैत छी । सर हमरे निहारि रहल छलखिन अखनो धरि।हम अपन आँखि झुकालति छी।

`असगर रहितौ त चुमिलितौ अँहाके।´

हम जनैत छियै हाथ मिलायब , सिना स लागि जायब , ककरो माथ चुमब सिनेह प्रकट करबाक बाट सब रहितौ अपने कनि भिन्न समुदाय स होबाक कारण ईह सब नहि नीक लागिजाइत छल।हम झिझकति कहैत छियै, ` हम आईतकि अपनेके ओहन नजर स नहि देखल।अपनेके हम बहुत श्रद्धा करैत छी सर।´

हमरा गंभीर भय कहैत सुनि सर चुप भजाइत छथिन।सरके आँखिमे तेहन नकारात्मक कुनो भाव नहि देख हमरा अपन कहब पर पश्चताप होइय।किछु नहि फुरारहल छल सरके मुड कोनाक बदलु।

चायलेने ट्रे मे ठार आदमी पुछति छै कुन चाय कुम्हर राखु ? हम झट्ट दय कहैत छियै बिना चिन्नीके उम्हर।उम्हरोबाला चिन्नी धायल यम्हर।ईह स्वीट समोसा बीचमे।सर हँस लगैत छथिन।हमरा नीक लाग लगैय।

हम सरके खौजबति कहैत छियै, ` ईह समोसा त स्वीट छै।अपने कोना खेब‌ै ?´

` ई त मीठेटा छै।अँहाक हाथक स्पर्श स विषो सुधा भयसकैत छै।हमरा खायमे कुनो आपत्ति नहि ज अँहा अपना हाथ स खुवाबी।´

हमरा सरक बात सुनि लाज आर हँसी दुनु सँग सँग चलिअबैत अछि।हम प्लेटमे समोसाके छोट छोट टुकरी बना काँटबाला चम्च आर दोसर चम्च दुनु धय सर दिस बढादति छियै।

सर हमरा दिस तकैत , ` खुवेतै के हमरा? ´
हम °उँह ´ कहि नजरमे उलहन आर ठोर पर मुस्कि पसारि सर दिस तकैत छियै।
सर हँसिक खायलगैत छथिन।

नव वर्षक उपलक्ष्यमे छोटछिन गेट टुगेदर राखल गेल छलै।कविता सुनायब,गीत गायब स माहोल रोमाञ्चित भेल छलै।सर बेरबेर हमरा अपना लग बैसलाय शोर पारिरहल छलखिन।फेउर सरके मजाकक भुत चढिगेल छनि बुझि हम नहि जाइत छलौ।सर सँग सटमसटा कय क स्त्रीगन सभके बैस‌ैत देखि हमरा बड आश्चर्य लागिरहल छल।ककरो कुनो लाजधाक नहि रहिगेल छलै।सरके मुह पर कुनो तरहक तेहन खुशीए नहि गमे देखारहल छलै। उन्टे मन आगिज भेल सनके भाव देखा रहल छलै। हम छकित छलौ देखि जे ईह उवाह सर छथिन ? सरके ईह नयाँ रुप हमरा हुनका प्रति आउर सम्मान स भरिदेलक।

अपना लग सिट खाली होइते सर हमरा बजब लगैत छलखिन विवेका आउ हमरा लग बैँसु। नहि त कम्तीमे एकटा फोटो त खिचालिय।सभ सँग अतेक रासे भेल अँहा सँग एकोटा नहि।सरके आवाजमे ओहिना सिनेह झलकि रहल छलनि।हमरा आउर लाज लागिजाइत छल।लग जायके बदला आउर छिटकि जाइत छलौ।

सभहक कानाफुसी सुनि हमर डेग आउर कि उठत ?।हम सभ लगमे छियैन से कुनो मतलबे नहि छनि।विवेका लाय परान सुखि रहल छनि।एकगोटाके त बर्दाश्त नहि भेलैन।घुमाफिराक हमरा उपर बहुत किछु बाजि देलखिन।हम किछु जबाब नहि दय चुप रहि जाइत छी।सर चुप नहि रहि ओकरा घुमाफिराक जबाब दद‌ैत छथिन।हम सर दिस तकैत के तकिते रहिजाइत छी।सर सेहो हमरे दिस ताकिरहल छलखिन।हमरा हृदयके जेना सुकुन मिल रहल होय।अतेक भिडोमे सरके हमर धियान छलनि।

सरके आर हमर रहब एकही रुटमे होबाक कारण सँगे आबिरहल छलौ।सर हमरा स पुछैत छथिन जे, ` केहन लागल आजुक प्रोग्राम ?´

` हमरा छोडु ।अपनेके त मन गदगदा गेल हायत।´

`से किएक ?´

` सभजे अपने सँ सटलेल आतुर छल।सार्वजनिक स्थानके सेहो कुनो मायने नहि रहिगेल छलै ? अहिसबलेल त आउर बहुत जगह छै ने ? अपनेके अपन प्रतिष्ठाके सेहो याद राखक चाहिँ ने?´

` कि करबै ? सभके विचार अहि सन नहि छकि।ककरो घरबाला विदेश छकि। ककरो अखन धरि वियाह नहि भेल छै । सभके अपन अपन विवशता छकि।
ककरो सटियाहीमे नीक लगैत छै।
एहन एहन बातके ओहिठाम छोरिदेबाक होइत छकि।´

हमरा एकएक कय बितल दृश्य सब आगुमे घुमिजाइय।ग्रुप फोटो लेबकालमे एनाक हमरामे ओ सभ सटल जारहल छलथि जे हमरा ओत स हटही परल।ताय हम फोटो सब लेबकालमे सकभर कातमे जाक ठार भगेल करैत छी।

°पन्द्रह बेर स बेसी हम अँहाके बजोने हायब सँग बैसलाय।मुदा अँहा ——–।जनैछी हमरा कतेक दुख लागल अछि। अँहाके बजबके कारण छल।सभ अँहा स कनिक डरायल सन रहैय।हबदय ककरो किछु करके आँट नहि होइत छकि।दोसर लग लबरी फुसियाही करबाला सभ सेहो अँहा लग कतेक भद्र भलाद्मी बनल रहैत अछि। अँहा हमरा लग रहितौ त सभ ढंग स रहैत हमरा सँग।´

हमरा लग कुनो जबाब नहि छल।हम निचा ताक लागल छलौ ।

` अँहि स हम जानि पेलौ सिनेह कि चिज होइत छै ? जनैछी हमरा पास नाम- दाम रहितोमे एक खालीपन छल।जीवनके उमंग हेरायल सन छल।अहि पतझड भेल देहियामे अहि स वसन्त आयल।कत गेल हमरा देल वचन?´

सर किछु शान्त भगेल छलखिन।

` अपनेही सँग त छलौ हम हरदम।कखनो ढारितो त नहि देखलौह जे लागत नसामे आबि बिसरि गेलौह ।ठीक छै, बुझाइय हमरे याद पार परत।सम्तोला हाथमे नहि लय केय आअ केने छलखिन? ककरा हमर हाथ खुवेने छलैक ?´

` ताय त कहैत छी कोनाक कृतज्ञता व्यक्त करु अँहाके । सब शब्द लगैय फिका परल सन।।भावक बाट पर चल सिखेबाक लेल ।´ ,कहैत सर हँसैत हमर माथ सोहराब लगैत छथिन।हम अबोध जाक सर दिस ताक लगैत छी।

कथा लेखक
सुधा मिश्र

Tags: मैथिली कथा

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